हर बार चुनाओं के समय जनता को विकास का भरोसा दिलाया जाता है , हर बार उनकी जिंदगी बेहतर करने की तस्सली दी जाती है | ये काम किसी एक पार्टी का नहीं बल्कि सभी पार्टियों का है | वोट पाने के लिए सभी पार्टियाँ पहले जनता को तरक्की का झांसा देती हैं और चुनाव जीतने के बाद अपने वादे और जनता की उम्मीद दोनों पर पानी फेर देंती हैं | लेकिन इस बार चुनाव को लेकर जनता का मिजाज कुछ अलग है | इस बार जनता ने कुछ ऐसा किया है की सभी राजनितिक पार्टियों के सर में दर्द हो सकत है | ये खबर है उत्तराखंड के पिथौरागढ़ गावं की , लोगों का कहना है कि हर साल पार्टियाँ उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के बहाने से वोट मांगती है और चुनाव जीतने के बाद किसी को कोई सुध नहीं रहती की जनता कैसी मुसीबतों का सामना कर रही है |

लोगों ने सभी नेताओं से अपनी परेशानियों के हल के लिए गुहार लगायी लेकिन उन्हें कोई हल नहीं मिला | अब जनता ने थक कर चुनाव का बहिष्कार करने का मन बना लिया है | पिथौरागढ़ के बॉडर्र तहसील मुनस्यारी ,गौला , जर्थी के गावं के लोगों ने 2019 से मोबाइल सेवा के लिए काफी बड़ा आन्दोलन शुरू किया था | 2019 में लोगों के आन्दोलन के बाद वहां के अधिकारीयों ने गावं वालों को भरोसा दिलाया की उनको जल्द मोबाइल सेवा की सुविधा प्रदान की जाएगी | लेकिन आज 2 साल बाद भी गावं में मोबाइल सेवा लोगों तक नहीं पहुचीं | साथ में और भी बहुत सारी परेशानी है जिससे लोग तंग आ चुके है और 2022 के चुनाव का बहिष्कार करने का दावा कर रहे हैं  |

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आपको बता दें कि , 2012 के चुनावों में नामिक गावं के लोगों को उनकी ज़रूरत की चीज़ें न प्रदान करने पर लोगों ने 2012 के चुनाओं का  बहिष्कार कर दिया था | साथ ही क्वीरी-जीमिया के गावं वालों ने 2017 और 2019 के विधानसभा चुनाव का बहिष्कार कर दिया था | आपको बता दें कि , बेलतड़ी के गावं के लोगों ने तो नारा दे दिया है ‘रोड नहीं तो वोट नहीं ‘ का और दो महीने से आंदोलन कर रहें हैं | जनता ने अपनी तरफ से कदम तो उठा लिया है लेकिन इसके बाद भी उन्हें बदलाव की कोई किरन नजर नहीं आ रही |

पिथौरागढ़ के डीएम आशीष चौहान ने कहा है कि , आज भी जिले में 27 गावं ऐसे है जिनमें मोबाइल सेवा नहीं है | उन्होंने अपनी ओर से सरकार को सूचित किया है और उनके आदेश का इन्तेजार कर रहें हैं | देश के बड़े-बड़े शहरों ने चाहे आज कितनी भी तरक्की कर ली हो लेकिन गावं के लोग आज भी बदहाली में अपना जीवन जीने को मजबूर हैं | न तो उन्हें अच्छी रोड पर चलने का हक़ है , न उन्हें पानी और बिजली कि सुविधाओं का हक़ है और बात करें मोबाइल सेवा की तो वो उनका हक़ नहीं है | चुनाव के दौरान बड़े – बड़े वादे करना और चुनाव जीत कर कहीं बिल में छुप जाना , ये नेताओं की फितरत हो चुकी है | इसलिए गावं वालों को मजबूर होकर इस चुनाव का बहिष्कार करना पड़ रहा है |

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