भारत ने किया जिस कला का तिरस्कार , चीन ने उसे ही बनाया अपना हथियार

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  • भारत एक ऐसा देश जहाँ न तो बुद्धिमत्ता की कमी रही है न कलाओं की | भारत न जाने कितनी कलाओं का जनक रहा है | भारत से न जाने कितनी कलाएँ निकली जो विदेशियों ने अपनायी | भारत में  भले ही एक से बढ़कर एक कला रही लेकिन हम भारतीयों ने कभी उनकी कदर नहीं की और उन्ही कलाओं को अपनाकर दूसरे देश हमसे आगे निकलते रहे | कितनी अजीब बात है, जिन कलाओं की उत्पत्ति हमारी धरती पर हुई उसके बारे में हम भारतीयों को ज्ञान ही नहीं | मार्शल आर्ट , हिप्नोटाइज , आयुर्वेद जैसी विद्याएँ हमारे भारत से निलकी और आज हम इनके बारे में बात तक नही करते ये सारी चीजे मूवीज में देख कर हमे बड़ा अच्छा लगता है बड़ा मज़ा आता है लेकिन इनके इतिहास के बारे में जानना कोई ज़रूरी नही समझता | जी हाँ ! अगर मार्शल आर्ट या कुंग फू की बात हो तो हमारे दिमाग में सबसे पहले चीन आता है क्योंकि हमे तो यही लगता है की इसे सीखने की सबसे अच्छी जगह चीन है | लेकिन कोई भी इसके इतिहास की वास्तविकता को नहीं जनता और न जानना चाहता |

 

लेकिन आज हम आपको मार्शल आर्ट और कुंग फू की असली जन्म भूमि से रूबरू कराएँगे | इस मार्शल आर्ट के पिता या जनक बोधिधर्मन थे | बोधिधर्मन कोई चीनी नहीं थे बल्कि वो एक भारतीय थे | बोधिधर्मन का जन्म दक्षिण भारत के पल्लव राज्य के कांचीपुरम के राजा के घर हुआ था | वो एक बोद्ध भिक्षु थे | लेकिन इसने जन्म की सटीक जानकारी कहीं नहीं मिलती | भले ही इनका जन्म शाही परिवार में हुआ हो लेकिन यह सन्यास लेकर जीवन के सही महत्व को समझना चाहते थे | इन्होंने लोभ मोह को त्याग गौतम बुद्ध के परम शिष्य महाकश्यप से ज्ञान प्राप्त किया साथ ही ध्यान सीखने की कला के साथ बौद्ध भिक्षु बनने की ओर अपना पहला कदम रखा |

अगर बात करें मार्शल आर्ट की तो वो बोधिधर्मन ही थे जिन्होंने चीन जाकर वहां इस कला को सिखाया था | अगर पुराणी कथाओं की माने तो इसका निजात सर्वप्रथम महर्षि अगस्त और भगवान श्री कृष्ण ने किया था | इस कला के माध्यम से बिना हथियारों के युद्ध किया जा सकता था |  भगवान् श्री कृष्ण भी इसी कला का प्रयोग कर के पापियों का नाश किया करते था | इस कला को पहले कालारिपयट्टू के नाम से जाना जाता था लेकिन समय के साथ इसके नाम में भी परिवर्तन आ गया | ऋषि अगस्त के द्वारा ये कला बोधिधर्मन ने सीखी और इस अनोखी और महान कला से सबको रूबरू करने के लिए ही बोधिधर्मन ने पूरे एशिया के देशों का भ्रमण किया | बोधिधर्मन ने इस कला को एक उच्च स्थान दिलवाया | जब इस कला को उन्होंने चीन में सिखाया तो उन लोगों ने इस कला का नाम ‘जैन बुद्धिज्म ‘ रखा |

जिन बोधिधर्मन को चीन में भगवान मान कर पूजा जाता है उनके बारे में भारत के लोग सही से जानते तक नहीं | कितनी अजीब बात है| आज अगर किसी भारतीय से इसके बारे में पूछा जाए तो शायद उन्हें पता नहीं होगा लेकिन चीन का बच्चा -बच्चा बोधिधर्मन से वाकिफ है | उन्होंने चीन के लोगों को मार्शल आर्ट तो सिखाया ही साथ में वहां जमकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया | कलारिपयाट्टू को मार्शल आर्ट की सबसे पुरानी तकनीक माना जाता है | जिसका निजात चीन में बोधिधर्मन ने किया | इस कला की उत्त्पति स्थान केरल को भी बताया जाता है | यह कला केवल शारीरिक व्यायाम और फुर्ती तक सिमित नहीं है | लेकिन क्या आप जानते हैं जब बोधिधर्मन पहली बार चीन के एक गाँव नोंजिंग पहुंचे थे तब वहां पर एक ज्योतिषी ने गाँव में एक बड़ी मुसीबत के आने की भविष्यवाणी की थी और जब बोधिधर्मन वहां पहुंचे तो वहां के लोगों ने उन्हें ही मुसीबत समझ लिया | और वहां के लोगों ने उन्हें वहां से चले जाने के लिए मजबूर कर दिया और बोधिधर्मन जंगल में रहने चले गए | लेकिन असली मुसीबत तो गाँव में अब आयी एक भयानक जानलेवा महामारी के रूप में | जिसने पूरे गाँव में हाहाकार मचा दिया तब बोधिधर्मन ने अपनी आयुर्वैदिक औषधियों के द्वारा उनका इलाज किया जिससे लोग समझ गए की बोधिधर्मन उनके लिए मुसीबत नहीं बल्कि उन्हें मुसीबतों से बाहर निकालने  वाले महान व्यक्ति हैं |

लोगों ने उनसे माफ़ी मांगी और उनका अपने गाँव में खुशी खुशी स्वागत किया | लेकिन एक मुसीबत के बाद ही उस गाँव में दूसरी मुसीबत आ गयी गाँव में कुछ लुटेरे घुस गए और गाँव के लोगों को मारने लगे उनके साथ बर्बरता करने लगे | गाँव के लोगों को लगता था कि बोधिधर्मन को केवल औषधियों का ज्ञान हैं वो ये नहीं जानते थे कि बोधिधर्मन सम्मोहन विद्या और कलारिपयाट्टू में भी पारंगत हैं | बोधिधर्मन ने अपनी सम्मोहन और कालारिपयट्टू की विद्या से उन लुटेरों का वो हाल किया की वो लुटेरे दुम दबा कर भाग गए | यह देख लोग अचंभित रह गए क्योंकि लोगों ने ऐसी कला कभी नहीं देखी| यह सब देखने के बाद लोग उनका और ज्यादा सम्मान करने लगे | लोगों के इच्छा जताने पर बोधिधर्मन ने उन्हें कलारिपयाट्टू की कला सिखायी | इसी तरह बोधिधर्मन ने उन्हें बहुत सारी कलाओं को सिखाया और आगे चल कर लोगों ने कलारिपयाट्टू का मुख्य केंद्र शोउलीन टैम्पल को बनाया | आज भी लोग इस कला को सीखने का सबसे अच्छा स्थान चीन के शोउलीन टैम्पल को मानते हैं और जब मार्शल आर्ट का नाम आता है तो सबसे पहले चीन को याद किया जाता है | इसी तरह यह कला भारत से निकल कर चाइना पहुँची |

इस कला को हर किसी को सिखाना चाहिए और जानना चाहिए की जिसे हम चीन की देन समझते हैं वो दरअसल भारत की देन है | और आज भी चीन के शोउलीन टैम्पल में बोधिधर्मन की एक बहुत बड़ी मूर्ति मौजूद है और वहां लोग उन्हें पूजते हैं |

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