चीन ने कई धमकियाँ दी लेकिन नैंसी पेलोसी ताइवान दौरे पर पहुँच गयी. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी का यूं ताइवान जाना चीन को एक आँख नहीं सुहा रहा. नैंसी पेलोसी का ताइवान जाना चीन की आँखों में खटक रहा है और इसीलिए चीन अमेरिका की तरफ कड़ा रुख अपना रहा है. इस समय नैंसी पेलोसी के ताइवान दौरे पर सभी देश नजरें टिकाएं हुए हैं. ताइवान का ये दौरा अमेरिका और चीन के बीच आपसी दरार को बढ़ावा दे रहा है. अमेरिकन हाउस स्पीकर पेलोसी 24 फाइटर जेट के कवर के बीच ताइवान पहुंची लेकिन यहां सवाल ये है कि आखिर चाइना को नैंसी के ताइवान जाने से इतनी दिक्कत क्यों हैं.

चीन को नैंसी के ताइवान जाने से क्यों हुई दिक्कत 

चीन ने अमेरिका पर समझौते को तोड़ने का आरोप लगाया और टार्गेटेड मिलिट्री एक्शन की बात कही. वहीं अमेरिका ने अपनी सफाई देते हुए कहा कि उसने किसी समझौते का उल्लंघन नहीं किया है और न चाइना की किसी पोलिसी को खंडित करने की कोशिश कर रहा है पर इसके साथ ही अमेरिका ने एक बात और साफ़ कर दी और कह दिया कि वो ताइवान की सुरक्षा के लिए हमेशा आगे रहेगा. यहां सोचने वाली बात ये है कि चाइना को आखिर क्या दिक्कत है और अमेरिका और चाइना के लिए ताइवान क्यों ज़रूरी है. दरअसल, ताइवान चीन के दक्षिण पूर्वी तट पर बसा एक द्वीप है और चाइना ताइवान के और चाइना अपनी पोलोसी के तहत अपने सीमावर्ती इलाकों के एरिया को अपना मानता है. लेकिन ताइवान खुद को चीन का हिस्सा नहीं मानता और खुद को एक अलग देश के रूप में देखता है. यहां तक की ताइवान का अपना संविधान भी है लेकिन चीन को ताइवान का ये रुख बिल्कुल गवारा नहीं है और वो ताइवान को इस बात लिए मजबूर करना चाहता है कि वो खुद को चीन का हिस्सा मानने लगे.

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लेकिन यहां दिक्कत ये है कि अमेरिका भी चीन की पोलिसी को मानता है पर चीन ताइवान पर अपना कब्ज़ा जमा ले ये अमेरिका को बर्दास्त है. ऐसा केवल ताइवान को लेकर नहीं है बल्कि आस – पास के ऐसे कई और देश भी हैं जो अमेरिका के लिए बहुत मायने रखते हैं और अमेरिका इनकी सुरक्षा के लिए सदैव तैयार रहता है और अगर चीन ने ताइवान पर हमला बोल दिया या कब्ज़ा कर लिया तो अमेरिकी विदेश निति के लिहाज से बहुत मुश्किल परिस्तिथियाँ आ सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो पश्चिमी प्रशांत महासागर में चीन अपना दबदबा दिखाने और मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा। गुआम व हवाई द्वीपों पर जो अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं उनको भी चीन के बढ़ते प्रभाव से खतरा होने की पूरी उम्मीद है.

जब दूसरा विश्वयुद्ध हुआ था उसके बाद चीन और ताइवान के सम्बन्ध ख़राब हो चुके थे दोनों के बीच अलगाव जैसी स्तिथि पैदा हो गयी थी. उस समय चीन में जो सत्ताधारी पार्टी(कुओमिन्तांग) थी उसकी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ लड़ाई चल रही थी. 1949 में वहां की मुख्य भूमि में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की विजय हो गयी और उन्होंने राजधानी बीजिंग को हथिया लिया.  वहीँ सत्ताधारी पार्टी के लोग वहां से भाग गए और जाकर ताइवान में बस गये. तब से अब तक ताइवान में (कुओमिन्तांग ) पार्टी ही वहां शासन कर रही है और मुख्य पार्टी के रूप में अपना दबदबा बनाए हुए है.